क्षत्रिय पोवार(पंवार) समाज

                                                  

                                          क्षत्रिय पोवार(पंवार) समाज

मालवा राजपुताना के मूलनिवासी पंवार(पोवार) अठारहवी सदी की शुरुवात में, देवगढ़ राजा के द्वारा मुगलों के विरूद्ध संघर्ष हेतु आह्वान पर धारानगरी से नगरधन(रामटेक के पास) आये और अपनी वीरता से इस क्षेत्र मुगलों के विरुद्ध देवगढ़ राजा को विजय दिलाई। देवगढ़ के राजा ने मालवा के इन पंवारों को जागीर, किले और कृषि भूमि प्रदान की। इस समय पंवार अपने परिवार के साथ नगरधन और नागपुर सहित भंडारा जिले में आकर बस गये। मराठा शासन के समय भी पोवारों की राजकरण और सैन्य क्षेत्र में बड़ी भूमिका थी। कटक सहित कई अभियानों में इन्होंने मराठाओं का साथ दिया और जीत दर्ज की। इसी विजय के कारण पोवारों को वैनगंगा क्षेत्र में बहुत सी भूमि प्राप्त हुयी और इनका विस्तार सिवनी से लेकर बालाघाट जिले लाँजी क्षेत्र तक हो गया।

१७७५ तक अधिकांश पंवार नागपुर-नगरधन क्षेत्र से वैनगंगा क्षेत्र में जाकर स्थायी रूप से बस चुके थे ।ब्रिटिश काल में पंवारों को सतपुड़ा के उस पार बैहर-परसवाड़ा क्षेत्र में बसने के अवसर मिलें और १८७५ तक मालवा के पंवार, मध्यभारत के बालाघाट, सिवनी, भंडारा(गोंदिया शामिल) जिलों की कई तहसीलों में बस चुके थे। इस क्षेत्र में आज लगभग ८०० गाँवों में पंवारों की बसाहट है।

पंवार समाज के छत्तीस कुल है और ये सभी पुरातन क्षत्रिय है। इन छत्तीस क्षत्रियों का संघ ही वास्तव में पंवार या पोवार कहलाता है। इनके वैवाहिक संबंध इन छत्तीस कुलों में ही होते हैं।मालवा से लेकर बुंदेलखंड और वैनगंगा क्षेत्र तक ये सभी एक समुदाय के रूप में साथ-साथ रहते आये हैं और यही कारण है की इनकी साझा संस्कृति और एक भाषा है जिसे पोवारी बोली कहते है। सैकड़ों वर्षो से क्षत्रियों का यह कुनबा अपनी विशेष पुरातन पहचान और संस्कृति को संरक्षित कर अन्य सभी समाजो के साथ एकता रखते हुए विकास के पथ पर अग्रसर है। आज जरुरत है की नई पीढ़ी अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, भाषा और संस्कृति का संरक्षण कर इसे आने वाली पीढ़ीयों को सौंपे।

Rishi Bisen

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